Thursday, 14 July 2016

रात और रास्ते

यूँ तो ट्रैफ़िक का शोर-शराबा किसे पसंद है, मग़र ढ़लती रात को जब सब शांत होने लगता है, सड़के ख़ाली हो जाती है, तब सरर्र से गुज़रती कुछ चंद गाड़ियों की हुँकार मुझे बड़ी अच्छी सी लगती है। वो हॉर्न की आवाज़ और तीख़ी हो जाती है। जैसे हमारे शाँत मन में कुछ ख़याल अचानक शोर कर जाते हैं, जगा जाते हैं, वैसे ही ये आवाज़ें रात के सन्नाटे को जगा जाती है। सड़को पर कितना कुछ बीतता है, गुज़रता है ना।
अभी अभी एक ट्रक गुज़रा था दूर से, वही बुलँद आवाज़ में हिनहिनाता हुआ। पता नहीं कहाँ से आया, और कहाँ जा रहा होगा। ड्राइवर कौन होगा, उसका परिवार कहाँ होगा, कितनी रातों को जागा होगा, कितने दिन बस सोया होगा। कहानियाँ होंगी बेहिसाब !
और अब शायद एक स्पोर्ट्स कार टाइप गुज़री है साँय-साँय करती। पॉर्श की हो शायद, या कोई और। होगा कोई जवाँ दिल अपने लड़कपन में झूमता हुआ, मचलता हुआ।
ट्रक और पॉर्श, और सड़क एक। सड़क भी 'क्लास डिफरेंस' को समझती होगी शायद? बतियाती भी होगी हर गुज़रती गाड़ी से। कहती होगी, सुनो, तुम जो भी हो, चार-पहिया, दू-पहिया या दस-पहिया, गुज़रना तो तुम्हें मुझ पर होकर ही है!

वैसे रास्तों की बात है तो मुझे उन पर जमे चौराहे बड़े पसंद है, जैसे तुम्हें चार तोहफ़े दिये हों कि जो चाहे ले लो। उम्मीद जैसे उमड़ती है, भरमाता भी है मन। यूँ तो रास्तों पर अब साइन बोर्ड्स होते ही हैं, मग़र कभी कभी लगता है कि ये ना होते तो बेहतर होता। अपने आप रास्ता खोजते, ग़ुम जाते, मिल जाते, फ़िर ग़ुम जाते, फ़िर मिल जाते।

ये है दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ ..